कांग्रेस राज में हिमाचल में आर्थिक आपातकाल, ₹1,10,010 करोड़ के कर्ज में प्रदेश: अनुराग सिंह ठाकुर

अनुराग ठाकुर का सुक्खू सरकार पर हमला: हिमाचल की अर्थव्यवस्था को कर्ज और ओवरड्राफ्ट की खाई में धकेल दिया, पहली बार 875 करोड़ का ओवरड्राफ्ट

कांग्रेस राज में हिमाचल में आर्थिक आपातकाल, ₹1,10,010 करोड़ के कर्ज में प्रदेश: अनुराग सिंह ठाकुर
पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं हमीरपुर सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की बिगड़ती वित्तीय स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला है। लोकसभा में उनके द्वारा पूछे गए अतारांकित प्रश्न संख्या 3605 के जवाब में केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने हिमाचल की अर्थव्यवस्था को कर्ज, उधारी और वित्तीय कुप्रबंधन के ऐसे दलदल में धकेल दिया है, जिसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा। केंद्रीय वित्त मंत्री के जवाब से सामने आए आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश की कुल बकाया देनदारियां वर्ष 2018 में 51,030 करोड़ रुपये थीं, जो वर्ष 2026 के बजट अनुमान में बढ़कर 1,10,010 करोड़ रुपये हो गई हैं। अनुराग ठाकुर ने कहा कि यह केवल कर्ज बढ़ने का आंकड़ा नहीं है, बल्कि सुक्खू सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद आर्थिक अनुशासन स्थापित करने के बजाय प्रदेश को लगातार उधार लेने पर निर्भर कर दिया। जिस राज्य को विकास, रोजगार और निवेश के नए अवसरों की ओर बढ़ना चाहिए था, उसे कांग्रेस सरकार ने कर्ज और बदहाल वित्तीय प्रबंधन की ओर धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि सबसे गंभीर स्थिति यह है कि हिमाचल प्रदेश वर्ष 2025 में वर्ष 2017-18 के बाद पहली बार ओवरड्राफ्ट में चला गया। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 से 2024 तक प्रदेश ने वेज़ एंड मीन्स एडवांसेज और ओवरड्राफ्ट के मामले में शून्य शेष बनाए रखा था। लेकिन वर्ष 2025 में स्थिति इतनी बिगड़ी कि प्रदेश को 777 करोड़ रुपये के वेज़ एंड मीन्स एडवांसेज पर निर्भर होना पड़ा और 875 करोड़ रुपये का ओवरड्राफ्ट लेना पड़ा। अनुराग ठाकुर ने कहा कि जिस प्रदेश ने वर्षों तक ओवरड्राफ्ट से दूरी बनाए रखी, उसे सुक्खू सरकार ने पहली बार इस स्थिति तक पहुंचा दिया। उन्होंने इसे हिमाचल की वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि यह सामान्य वित्तीय प्रबंधन नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक नाकामी का खुला प्रमाण है। उन्होंने कहा कि प्रदेश का डेब्ट-टू-जीएसडीपी रेश्यो वर्ष 2026 के बजट अनुमान में बढ़कर 42.8 प्रतिशत हो गया है, जबकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का राष्ट्रीय औसत 29.2 प्रतिशत है। यानी हिमाचल का कर्ज का बोझ राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि सरकार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश लगातार खुले बाजार से भारी कर्ज उठा रहा है। वर्ष 2022-23 में ग्रॉस मार्किट बोर्रोविंग्स 14,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गईं। इसके बाद भी उधारी का सिलसिला नहीं रुका और वर्ष 2024-25 में 7,359 करोड़ रुपये, वर्ष 2025-26 में 9,864 करोड़ रुपये की ग्रॉस मार्किट बोर्रोविंग्स की गईं। इतना ही नहीं, 31 जुलाई 2026 तक ही 2,800 करोड़ रुपये का और कर्ज लिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि सुक्खू सरकार का आर्थिक मॉडल प्रदेश की आमदनी बढ़ाने के बजाय कर्ज बढ़ाने पर टिका है। सरकार के पास न तो वित्तीय अनुशासन है, न दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि और न ही प्रदेश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की कोई ठोस दिशा। अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने हिमाचल को ऐसी वित्तीय स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां पुराना कर्ज चुकाने और मौजूदा खर्च चलाने के लिए नए कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। 1,10,010 करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां, 42.8 प्रतिशत डेब्ट-टू-जीएसडीपी रेश्यो, 875 करोड़ रुपये का ओवरड्राफ्ट और लगातार हजारों करोड़ रुपये की बाजार उधारी सुक्खू सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन की पूरी कहानी बयां करती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा हिमाचल की जनता भुगत रही है। प्रदेश के विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और भविष्य की आर्थिक क्षमता पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुक्खू सरकार ने हिमाचल की वित्तीय नींव को मजबूत करने के बजाय उसे लगातार कमजोर किया है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि हिमाचल को इस गंभीर वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए तत्काल संरचनात्मक आर्थिक सुधार, वित्तीय अनुशासन, राजस्व वृद्धि और कर्ज प्रबंधन की जरूरत है। यदि यही रफ्तार जारी रही तो प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों पर कर्ज का बोझ और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि जनता अब सरकार से सवाल पूछ रही है कि आखिर वह हिमाचल की अर्थव्यवस्था को कब तक कर्ज और ओवरड्राफ्ट के सहारे चलाएगी।