भारत की साहित्यिक परंपरा व संपदा पश्चिम से अधिक प्राचीन और श्रेष्ठ: अनुराग सिंह ठाकुर

भारत की साहित्यिक परंपरा व संपदा पश्चिम से अधिक प्राचीन और श्रेष्ठ: अनुराग सिंह ठाकुर
पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के वेदव्यास परिसर, बलाहर में आयोजित क्षेत्रीय नाट्य महोत्सव के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए संस्कृत, कला, साहित्य और नाट्य परंपरा पर विस्तार से अपने विचार रखे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संस्कृत नाटक का मंचन केवल मनोरंजन या अकादमिक विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और ज्ञान-परंपरा का जीवंत प्रतिबिंब है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से भारत में संस्कृत नाट्य मंचन की परंपरा लगभग लुप्तप्राय हो गई थी, लेकिन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायक है। उन्होंने इस पहल को भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। अनुराग सिंह ठाकुर ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि इस्लामिक शासनकाल और बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा दोनों गंभीर संकट में रहे और लंबे समय तक उपेक्षित रहे। उन्होंने कहा कि उस कठिन दौर में भारतीय विद्वानों ने अपनी संपत्ति, परिवार और यहां तक कि अपने जीवन से अधिक महत्व ग्रंथों, शास्त्रों और पांडुलिपियों के संरक्षण को दिया। इन विद्वानों का मानना था कि यदि भारत की ज्ञान-संपदा सुरक्षित रहेगी तो संस्कृति, परंपरा और सभ्यता भी सुरक्षित रहेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारे पूर्वजों के इन बौद्धिक बलिदानों की चर्चा इतिहास में बहुत कम मिलती है, लेकिन राष्ट्र हमेशा उनके प्रति ऋणी रहेगा जिन्होंने ज्ञान और संस्कृति की रक्षा के लिए मौन संघर्ष किया। उन्होंने आगे कहा कि भारत की साहित्यिक परंपरा और संपदा पश्चिमी सभ्यता की तुलना में कहीं अधिक प्राचीन, समृद्ध और दार्शनिक रूप से उन्नत रही है। भारतीय संस्कृत नाटक अधिकतर सुखांत होते हैं, जबकि पश्चिमी साहित्य में त्रासदी की परंपरा प्रबल रही है। यह भारतीय जीवन-दर्शन को दर्शाता है, जहां अभाव में भी संतोष, संघर्ष में भी आशा और कठिनाइयों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बना रहता है। उन्होंने कहा कि भारत मूलतः आशावाद की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, न कि निराशावाद का। अनुराग सिंह ठाकुर ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी और जेन-जी के बीच संस्कृत को लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल अंग्रेजी तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और देवभाषा संस्कृत में भी पारंगत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जितना जोर आज बच्चों को अंग्रेजी सिखाने पर दिया जाता है, उसका एक अंश संस्कृत शिक्षा पर भी दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार संस्कृत वह कुंजी है जिससे भारत की विशाल बौद्धिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत के ताले खोले जा सकते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि संस्कृत को केवल देवभाषा तक सीमित न रखकर जन-जन की लोकभाषा बनाया जाए। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (NMM) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस मिशन की शुरुआत 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने की थी। इसका उद्देश्य इंडोलॉजी अर्थात प्राच्यविद्या का संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण करना था। इस मिशन के तहत देशभर से दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह, संरक्षण, कैटलॉगिंग और प्रकाशन किया जाना था। उन्होंने कहा कि 2004 के बाद जब सरकार बदली तो इस मिशन को वह प्राथमिकता नहीं मिली, जिसके कारण इसका कार्य धीमा पड़ गया। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को पुनर्जीवित किया गया और नई गति दी गई। उन्होंने बताया कि वर्तमान सरकार ने इस मिशन का बजट बढ़ाया है, जिसके परिणामस्वरूप आज लाखों पांडुलिपियों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जा चुका है और यह कार्य निरंतर जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में संस्कृत नाट्य पांडुलिपियां भी खोजी गई हैं, जिन पर शोध, अनुवाद और प्रकाशन का कार्य चल रहा है। उन्होंने इसे भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। समारोह के अंत में उन्होंने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।